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प्रेम विरह
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प्रेम तो ईश्वर का सक्षात वरदान है जिसने भी इसे पाया वह सदा -सदा के लिए अमर हो जाता है प्रेम में इतनी शक्ति होती है कि
वह जहर को भी अमृत बना देता है जैसे मीरा ने जहर का प्याला पीया और प्रेम की प्रतिक्रिया से जहर अमृत में बदल गया और मीरा को कुछ भी नहीं हुआ मीरा ने प्याले में जहर के रूप में अमृत का स्वाद चख लिया जब प्रेम का रोग लगता है तब अंदर ही अंदर प्रियतम से मिलने की प्यास बढ़ जाती है और
आग लगती हैतो धुआं भी अवश्य उठता है यह धुआं ही विरह के रूप में सामने आता है प्रिया अपने प्रेमी के पासरहने को तड़पने लगती है मगर ऐसा संभव होता नहीं है औरएक प्रेमिका या विरहन अपने प्रेमी कोदेखने के लिए तो कभी
उससे बाते करने के लिए तो कभी मिलने के लिए रह -रहकर तरसती हुई विरह के घोर सुनसान दुःख में अंदर ही अंदर सुलगने लगती है क्योकि यह प्रकृति का ही नियम होता है कि आग के बाद धुआँ और प्रेम के बाद विरह या कहे जिस प्रकार सोना आग में तपकर कुंदन हो जाता है उसी प्रकार प्रेम भी विरह कीअग्नि में तपकर शुद्ध खरा दिव्य प्रेम बन जाता है ऐसा ही प्रेम अपने ईश्वर को और गुरु को या किसी अन्य लक्ष्य् को प्राप्त करके रहता है स्त्री वैसे भी प्रेम की मूर्ति मानी गयी है क्योकि उसका हृदय पक्ष पहले से ही खुला रहता है वह इस हृदय पक्ष में बच्चे के प्रति माँ का प्यार कभी परिवार का प्यार कभी पति का प्यार इस संसार में निर्वहन करती है यही प्रेम आगे बढ़कर ईश्वर के प्रति हो जाए तो ईश्वर को भी प्राप्त कर लेती है ऐसा नहीं है कि आदमी इस प्रेम को प्राप्त नहीं कर पता बात यह है किआदमी दिमागसे सोचता है इसीलिए वह शारीरिक शक्ति का अधिक उपयोग करता है लेकिन जो पूजा पाठ अधिक करते है वे धीरे- धीरे साधना करते हुए इस प्रेम तत्व को प्राप्त कर लेते है अतः विरह तत्व के बिना प्रेम तत्व की शुद्धि नहीं होती अतः प्रेम के मार्ग में विरह आवश्यक तत्व है सबसे ज्यादा विरह तत्व का अहसास राधा ने किया क्योकि श्याम राधा जी के साथ पूरे बचपन साथ साथ रहे और जब वे मथुरा ,वृन्दावन बरसाना छोड़कर चले गए और एक दूसरे का साथ छूटा तो राधा सूखकर
काँटा हो गयी और छुआरे जैसी पतली हो गई उनका खाना पीना सब कुछ छूट गया तब राधाजी जीवन में विरह को सहती रही विरह पीड़ा में कृष्ण के आने की राह ताकने लगी कि कृष्ण कभी तो वापिस आयेगे और जब वे वापिस लौटेंगे तो मेरी इस पीड़ा का अंत हो जायेगा जीवन के अंतिम समय में भी कृष्ण नहीं लौटे तो राधा ने अपने विरह का अंत कर प्राण तजने की सोची यह देखकर श्याम पीपल की तरह काँप गए और उसी समय अपनी दिव्य शक्ति के माध्यम से राधे जी के सामने प्रकट हो गए और राधा ने प्रभु श्याम को देखा तो उनके सीने से लगकर रोने लगी इस क्रंदन और रूदन को सुनकर पूरा ब्रह्माण्ड कांप गया तब कृष्ण ने राधा को बड़ी मुश्किल से चुप कराया और कहा राधे तुमने अपने अश्रुओ को नहीं रोका तो तीनो लोक तुम्हारे अश्रुओ के प्रवाह से बहकर डूब जायेगे तब राधे किसी प्रकार चुप हुई और श्री कृष्ण अपने प्रियतम से कहने लगी अब में तुम्हारे बिना एक पल भी नहीं रहूगी और इस प्रकार से प्रभु ने भी साथ रहने के लिए हामी भर दी और राधा जी को कृष्ण ने पूर्ण यौवन वापिस प्रदान कर दिव्य प्रेम प्रदान किया और कृष्ण ने कहा कि राधे अब मुझे तुमसे कोई अलग नहीं कर सकता तुम्हारे बिना मेरा प्रेम भी अधूरा है इस प्रकार से प्रेम तत्व की पूर्णता हुई अब तो रोज़ दिव्य प्रेम की नयी नयी लीलाये होने लगी इन दिव्य लीलाओ की वजह से राधा सदा सदा के लिए अमर हो गयी अब तो राधा कृष्ण बन गयी और कृष्ण ही राधा बन गए अब दोनों में कोई तात्विक अंतर नहीं रहा विरह लीला वास्तव में विरह पीड़ा के रूप में एक प्रेमानंद ही है ऐसी विरह जिसमे दुःख होते हुए भी प्रेम का आनंद बना रहता है शेष आगे ---------------
आपका -योगी चिंतन
Email: hari.construction@yahoo.com
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